"बदसूरत कैमरूनियन, जिसने लिखना तक नहीं सीखा" — पैराग्वे की सीनेटर सेलेस्ते अमारिया ने वर्ल्ड कप के प्री-क्वार्टर फाइनल में फ्रांस के हाथों पैराग्वे की 1-0 से हार के बाद किलियन म्बाप्पे को इन्हीं शब्दों में निशाना बनाया। सोशल मीडिया पोस्ट में सीनेटर ने 27 साल के इस फॉरवर्ड को "गुलाम मानसिकता वाला कैमरूनियन" करार दिया, जो जिद करके खुद को फ्रेंच साबित करने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने यह भी अफसोस जताया कि फाइनल सीटी के बाद मैदान पर किसी ने उसे "सरेआम थप्पड़" नहीं मारा। म्बाप्पे की पढ़ाई और उनकी जड़ों का मजाक उड़ाने वाली इस तीखी टिप्पणी पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुरंत आक्रोश भड़क उठा।

जवाब आने में देर नहीं लगी। बीबीसी में छपे बयान में म्बाप्पे ने पलटवार करते हुए कहा, "आप एक घटिया और अयोग्य महिला हैं।" फॉरवर्ड ने जोर देकर कहा कि इस तरह की बेतुकी नस्लभेदी सोच पैराग्वे के खिलाड़ियों की ऐतिहासिक मेहनत को छोटा करती है और टूर्नामेंट के दौरान देश ने जो जज्बा दिखाया, उस पर साया डालती है। वहीं फ्रेंच फुटबॉल फेडरेशन ने इस घटना को "घृणित" बताया और आपराधिक मामला दर्ज कराने का ऐलान किया, जिससे यह विवाद खेल के मैदान से निकलकर अदालत तक पहुंच गया।

पैराग्वे की अपनी संस्थाओं ने बिल्कुल अलग रुख अपनाया और अमारिया के शब्दों को देश की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला बताया। सरकार और सांसद योहाना ऑर्टेगा ने फ्रांसीसी जनता से माफी मांगी और कहा कि नस्लवाद उनके मूल्यों के खिलाफ है और अपने "नफरत भरे भाषण" की जिम्मेदारी अकेले इस सांसद की है। फ्रांस मोरक्को के खिलाफ क्वार्टर फाइनल की तैयारी में जुटा है, लेकिन एक सवाल अब भी हवा में है: क्या खेल भावना की एकजुटता कभी उन गहरी राजनीतिक और नस्लीय खाइयों को पाट पाएगी, जो मैदान के बाहर इतनी तीखी शक्ल में सामने आती हैं?
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